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Kidney Related Problems and their Treatment

Kidney Related Problems and their Treatment
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किडनी क्या काम करती है ? (Kidney What works ?)

किडनी हमारे शरीर से गंदगी बाहर निकालने वाले सिस्टम का एक बहुत मजबूत हिस्सा हैं। दोनों किडनियों में खून साफ होता है। हमारी किडनियों में लाखों मिनी फिल्टर होते हैं जिन्हें नेफरोंस कहते हैं जो पूरी जिंदगी खून साफ करने का काम करते हैं।

किडनी में होने वाले इस सफाई सिस्टम के कारण हमारे शरीर से हानिकारक केमिकल्स पेशाब के साथ बह जाते हैं। ज्यादातर लोग दो किडनियों के साथ पैदा होते हैं। दोनों किडनी बीन के आकार की होती है और हमारी पसलियों के बीच में सुरक्षित रहती हैं।

किडनी के अन्य कामों में लाल रक्त कण का बनना और फायदेमंद हार्मोंस रिलीज करना शामिल हैं। किडनियों द्वारा रिलीज किए गए हार्मोंस के द्वारा ब्लड प्रेशर नियंत्रित किया जाता है और हड्डियों के लिए बेहद जरूरी विटामिन डी का निर्माण किया जाता है।

किडनी हमारे शरीर का एक अकेला ऐसा आर्गन है जिसके 80प्रतिशत खराब होने के बाद भी बीमारी का आसानी से पता लगाना मुश्किल हो जाता है,हर व्यक्ति को हर छ: माह पर L. F .T test (यानि लिवर फंशन टैस्ट) करवाना चाहिये इससे यह पता चलता है कि किडनी (गुर्दे) ठीक काम कर रहे हैं या नहीं

हमें स्वस्थ  रहने के लिये किडनी का स्वस्थ रहना जरूरी है। किडनी की गंभीर बीमारी होने पर भी जब तक इसका पता लगता है काफी देर हो चुकी होती हैऔर मरीज को पता भी नहीं चलता कि वह किड़नी की बीमारी से ग्रसित है इसलिये अच्छा है कि नियमित जांच करवायें।

एक बार यदि किडनी किसी बींमारी से ग्रसित हो जाये तो पूरे शरीर को प्रभावित करती है कारण किडनी का प्राथमिक काम है जहरीली चीजों को अलग करना हैजो बीमार किडनी की वजह से रूकावक आती है और प्रभावित अंगो के लक्षण सामने आते हैं जैसे भूख न लगना,उल्टी आना,शरीर में सूजन आना पेशाब ज्यादा ही आना इन सब की रोकथाम का एक  ही तरीका है किडनी की जांच करवाते रहें

किडनी ख़राब होने के प्रमुख कारण ? (The leading cause of kidney failure ?)

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के बयान में कहा गया कि डायबिटीज और हाईपरटेंशन दो ऐसी समस्याएं हैं जो क्रॉनिक किडनी रोग के प्रमुख कारण हैं।

देश में क्रॉनिक किडनी रोग या सीकेडी बढ़ रहा है और अगर समय रहते हम सचेत न हुए तो हमारी किडनी की कार्यप्रणाली क्षतिग्रस्त हो सकती है, किडनी फेल भी हो सकती है और डायलसिस पर निर्भर रहना पड़ सकता है या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है।

    हाई ब्लड प्रेशर और हाई ब्लड शूगर पर नियंत्रण करके सीकेडी के 50 प्रतिशत मामलों और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है जिसमें जान जाने का भी खतरा होता है।

    आम तौर पर क्रॉनिक किडनी रोग के लक्षण नजर नहीं आते और अचानक कभी ब्लड या यूरीन टेस्ट करवाने से इसका पता चलता है।
हम अपनी किडनियों को बचा सकते हैं, अगर अपना निम्नतम ब्लड प्रेशर और भूखे पेट ब्लड शूगर 80 पर बनाए रखें। वजन संतुलित रखें। हर साल किडनी की जांच करवाएं और डॉक्टर से ईजीएफआर टेस्ट के लिए कहें, किडनी के नुकसान की जांच जल्दी से जल्दी करवाएं।

किडनी (गुर्दे ) की पथरी कैसे बनती है ? (Renal ( kidney ) stones How is made ?)

रोजाना भोजन करते समय उनमें जो कैल्शियम फॉस्फेट आदि तत्व रह जाते हैं, पाचन क्रिया की विकृति से इन तत्वों का पाचन नहीं हो पाता है। वे गुर्दे में एकत्र होते रहते हैं। कैल्शियम, फॉस्फेट के सूक्ष्म कण तो मूत्र द्वारा निकलते रहते हैं, जो कण नहीं निकल पाते वे एक दूसरे से मिलकर पथरी का निर्माण करने लगते हैं। पथरी बड़ी होकर मूत्र नली में पहुंचकर मूत्र अवरोध करने लगती है। तब तीव्र पीड़ा होती है। रोगी तड़पने लगता है। इलाज में देर होने से मूत्र के साथ रक्त भी आने लगता है जिससे काफी पीड़ा होती है।

किडनी संबंधी बीमारियों के क्या लक्षण हैं ? (What are the symptoms of kidney disease ?)

युरिनरी फंक्शन में बदलाव : सबसे पहला लक्षण जो उभर कर आता है वह है युरिनरी फंक्शन में बदलाव। हम बता चुके हैं किडनियां शरीर की भीतरी सफाई करती हैं और पेशाब के रूप में अवशिष्ट पदार्थ बाहर निकालती हैं।

किडनी में उत्पन्न समस्या के चलते युरीन (पेशाब) के रंग, मात्रा और कितने बार पेशाब आती है में बदलाव आ जाएगा। इसके अलावा आप इन लक्षणों पर ध्यान दे सकते हैं।

1. रात में बार बार पेशाब आना।
2. पेशाब की इच्छा होना परंतु बाथरूम में जाने पर पेशाब न होना। 
3. हमेशा से ज्यादा गहरे रंग में पेशाब आना।
4. झाग वाली और बुलबुलों वाली पेशाब आना। 
5. पेशाब में खून दिखना। 
6. पेशाब करने में दर्द होना या जलन होना। 
पीठ दर्द का कारण न समझ पाना: आपकी पीठ और पेट के किनारों में बिना वजह दर्द महसूस करना किडनी में इंफेक्शन या किडनी संबंधी बिमारियों के लक्षण हो सकते हैं। जब किडनी सही तरीके से काम करना बंद कर देती हैं तो आप चाहे जब दर्द महसूस करते हैं।
इसके अलावा शरीर अकड़ना और जोड़ों में समस्या सामने आती है।पीठ में नीचे की तरफ होने वाले दर्द की एक वजह किडनी में पथरी भी हो सकती है। पोलिसासिस्टिक रेनाल डिजिज एक वंशानुगत बीमारी है जिससे किडनी के सिस्ट में पानी भर जाता है और पीठ में नीचे, एक तरफ या पेट में दर्द होने लगता है।
शरीर में सूजन आना : हमारी किडनियां शरीर से गंदगी बाहर फेंकती हैं साथ ही शरीर में से अतिरिक्त तरल पदार्थ को भी निकालती हैं। जब किडनियों की कार्यप्रणाली में कोई दिक्कत आती है तो शरीर से बाहर न निकलने वाली गंदगी और तरल पदार्थ समस्याएं उत्पन्न करते हैं।
जिनसे शरीर में सूजन आ जाती है। यह सूजन हाथों, पैरों, जोड़ों, चेहरे और आंखों के नीचे हो सकती है। अगर आप अपनी त्वचा को उंगली से दबाएं और डिम्पल थोड़ी देर तक बने रहें तो डॉक्टर के पास जाने में देर न करें।
चक्कर आना और कमजोरी : जब किडनियों के कार्यप्रणाली में अवरोध उत्पन्न होता है तो आपको हमेशा चक्कर आने की संभावना बढ़ जाती है। पूरे समय आप थकावट महसूस करते हैं और कमजोरी का एहसास होता है।
ये लक्षण खून की कमी और गंदगी के शरीर में जमा होने से उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि किडनियां उनका कार्य सही प्रकार से नहीं कर पा रही हैं। शरीर में एनीमिया की स्थिति बनने से सर घुमना, हल्का सरदर्द, बैलेंस न बनना जैसे लक्षण उभरते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एनीमिया की वजह से दिमाग तक जरूरी मात्रा में खून नहीं पहुंच पाता। बाद में समस्या याददाश्य तक पहुंच जाती है और कोई भी काम से ध्यान भटकने लगता है। इसके अलावा सोने में भी मुश्किल आने लगती है।
अपनी स्वस्थ अवस्था में किडनी इर्यथ्रोपोइटिन नाम का हार्मोन बनाती हैं। यह हार्मोन शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह का कार्य करने वाले लाल रक्त कणों की संख्या में इजाफा करता है। जब किडनी अपना कार्य निष्पादित नहीं कर पातीं तो लाल रक्त कणों की संख्या घट जाती है।
इसके अलावा शरीर की गंदगी बाहर न निकलने से भूख लगना कम हो जाता है और आप कमजोरी महसूस करने लगते हैं। आप सांस फूलने जैसी समस्या भी महसूस कर सकते हैं। किडनी शरीर से गंदगी निकालने के साथ ही खून के प्रवाह को भी सुचारू करती है। किडनी में परेशानी होने से फेफड़ों में भी मुश्किल खड़ी होती हैं और सांस लेने में परेशानी उत्पन्न होने लगती है।
स्किन खुरदुरी हो जाना और खुजली होना : अचानक से त्वचा फटना, रेशेज होना, अजीब लगना और बहुत ज्यादा खुजली महसूस होना शरीर की गंदगी के एकत्रित होने के परिणाम हो सकते हैं।
किडनी के निष्प्रभावी हो जाने से शरीर में कैल्सियम और फॉस्फोरस की मात्रा प्रभावित हो जाती है जिससे अचानक से बहुत ज्यादा खुजली होने लगती है। जिससे आमतौर पर स्वस्थ त्वचा भी फटने लगती है, खुरदुरी हो जाती है और खुजली होती है।
उल्टियां आना : किडनी से जुड़ी समस्याओं के परिणामस्वरूप उल्टी आने जैसे लक्षण आम बात हो जाते हैं। इसके अलावा गैस से जुड़ी समस्याएं हर सुबह सामने आती हैं। अगर आप उल्टी के दवाईयां लेने के बाद भी समस्या को जस की तस पाएं तो फौरन डॉक्टर से पूरा चेक करवाएं ।
गीली सी ठंड लगना : अच्छे मौसम के बावजूद अजीब सी ठंड लगना और कभी-कभी ठंड लगकर बुखार भी आ जाना। आपके आसपास किसी को भी ठंड न लगे और तापमान भी ज्यादा हो परंतु बावजूद इसके आपको ठंड का एहसास हो तो डॉक्टर की सलाह बेहद जरूरी है।

किडनी के रोग कितनी तरह के होते हैं ? (How many kinds of kidney disease ?)

किडनी के रोग पांच तरह के होते हैं इस रोज के चरणों को पहचानने के लिए इसे विभिन्न भागो में बांटा गया है, जिसके जरिये रोगी की स्थिति का पता चलता है और उसी के हिसाब से उसका इलाज सही प्रकार से किया जा सकता है!-
पहला चरण (First Stage )
नार्मल क्रीयेटीनिन, एक पुरुष के 1 डेसिलीटर खून में .6-1.2 मिलीग्राम और एक महिला के खून में 0.5-1.1 मिलीग्राम EGFR (Estimated Glomerular Filtration rate) सामान्यत: ९० या उससे ज्यादा होता है!
दूसरा चरण ( Second Stage):
इस stage में EGFR कम हो जाता है जो 90% – 60% तक हो जाता है, लेकिन फिर भी क्रीयेटीनिन सामान्य ही रहता है! लेकिन मूत्र में प्रोटीन ज्यादा आने लगता है!
तीसरा चरण (Third Stage )
इस stage में EGFR और घट जाता है जो 60-30 के बीच हो जाता है और क्रीयेटीनिन बढ़ जाता है! इस चरण में ही किडनी रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते है, पेशाब में यूरिया बढ़ने से खुजली होने लगती है, मरीज एनेमिया से भी ग्रसित हो सकता है!
चौथा चरण(Fourth Stage )
इस चरण में EGFR 30-50 तक आ जाता है और थोरी सी भी लापरवाही खतरनाक हो सकती है इसमे क्रीयेटीनिन भी 2-4 के बीच हो जाता है! अगर सावधानी नहीं बरती गई तो डायलेसिस या फिर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है!
पाचवां चरण (Five Stage )
इसमे EGFR 15 से नीचे (कम ) हो जाता है तथा क्रीयेटीनिन 4-5 या अधिक होता है इसमे मरीज को डायलेसिस या ट्रांसप्लांट तक करानी पड़ जाती है!
अगर आप अपने स्वास्थ्य पर लगातार नज़र रखे तो इन रोगों से बचा जा सकता है इसके लिए आपको निम्न बत्तों का ध्यान रखना होगा 
गहरे रंग के साग सब्जी खाने चाहिए उनमे मेगनीसियम अधिक होता है, मेगनीसियम किडनी के लिए बहूत फायदेमंद होता है!  प्रोटीन, नमक, और सोडियम कम मात्र में खाए!
30 साल की उम्र से ही ब्लड प्रेशर और शुगर की नियमित जाँच करते रहना चाहिए
नियमित व्यायाम करे, अपने वजन को बढ़ने न दे, खाना समय पर और जितनी भूख हो उतनी ही खाएं, बाहर का खाना ना ही खाए तो बेहतर है, सफाई के खाने में विशेष ध्यान रखे, तथा पोषक तत्वों  से भरपूर भोजन करें!
अंडे के सफ़ेद वाले भाग को ही खाए उसमे किडनी को सुरक्षित रखने वाले तत्व जैसे के फोस्फोरस और एमिनो एसिड होते है
मछली  खाए इसमे ओमेगा 3 फैटी एसिड किडनी को बीमारी से रक्षा करता है!
प्याज, स्ट्राबेरी, जामुन, लहसुन इत्यादी फायेदेमंद होते है ये मूत्र के संक्रमण से बचाते है तथा लहसुन में उपस्थित एंटी ओक्सिडेंट एवं एंटी क्लोटिंग तत्व दिल की रख्षा करता है और कोलेस्ट्रोल को कम करता है तथा किडनी के लिए फायदेमंद होता है!
किडनी मरीजो की जीवन शैली – किडनी के रोगों में क्रोनिक नेफराईटीस बड़ी वजह हुआ करती थी लेकिन अब शूगर बड़ी वजह माना जाता है और उसके बाद इस बीमारी की बड़ी वजहों में हाइपरटेंशन व क्रोनिक नेफराईटीस का नंबर आता है!
किडनी की हर stage को लोग डायलेसिस से जोड़ देते है जबकि शरीर को डायलेसिस की जरूरत लगभग 95% डैमेज होने के बाद ही पड़ती है
पंचगव्य औषधी में इसका इलाज संभव है और सस्ता भी

पेशाब में इन्फेक्सन, जलन एवं अन्यान्य पेशाब सम्बन्धित रोग तथा कीडनी का काम न करना मूत्राशय में पथरी ,बार बार पेशाब आना इत्यादि रोगों में लाभकारी:-

— RENOL (रेनोल) —
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धन्यवाद
विनोद चहल
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