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छोटी हरड़ में पांचो रस पाए जाते हैं इसलिए अमृत से भी श्रेष्ठ है

छोटी हरड़ में पांचो रस पाए जाते हैं इसलिए अमृत से भी श्रेष्ठ है
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छोटी हरड़ choti Harad,

(टर्मिनेलिया चेब्यूला), Terminalia chebula, हरीतकी

छोटी हरड़ का वर्ण भूरा-काला तथा आकार में यह छोटी होती है । यह गंधहीन व स्वाद में तीखी होती है । फल के स्वरूप, प्रयोग एवं उत्पत्ति स्थान के आधार पर भी हरड़ को कई वर्ग भेदों में बाँटा गया है पर छोटी स्याह, पीली जर्द, बड़ी काबुली ये 3 ही सर्व प्रचलित हैं ।

छोटी हरड़ जो की भारत में हरीतकी के नाम के साथ साथ अभया, पथ्या, पूतना, अमृता, हैमवती, चेतकी, विजया, जीवंती और रोहिणीआदि नामों से प्रचलित है हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथो और चिकित्सा साहित्य में अत्यधिक सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है । राज बल्लभ निघण्टु के अनुसार-

यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी । 
कदाचिद् कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी॥ 

अर्थात् हरीतकी (छोटी हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है, परन्तु उदर स्थिति अर्थात् खायी हुई हरड़ कभी भी अपकारी नहीं होती ।

आर्युवेद के ग्रंथकार हरीतकी की इसी प्रकार स्तुति करते हैं वे कहते हैं कि  ‘तू हर (महादेव) के भवन में उत्पन्न हुई है इसलिए अमृत से भी श्रेष्ठ है ।’ वस्तुतः यह मूल रूप से गंगा के किनारे बसने वाला वृक्ष भी है । ड्यूथी ने अपने प्रसिद्ध ‘फ्लोरा ऑफ द अपर गैगेटिक प्लेन’ ग्रंथ में लिखा भी है कि हरड़ का मूल स्थान गंगातट ही है । यहीं से यह सारे भारत और विश्व में फैली है । मदनपाल निघण्टु में ग्रंथाकार लिखता है-
हरस्य भवने जाता हरिता च स्वभावतः ।
 हरते सर्वरोगांश्च तस्मात् प्रोक्ता हरीतकी॥ 
अर्थात् श्री हर के घर में उत्पन्न होने से,  स्वभाव से हरित वर्ण की होने से तथा सब रोगों का नाश करने में समर्थ होने से इसे हरीतकी कहा जाता है ।

छोटी हरड़ को हिंदी में इसे हरड़, हर्रे, हर्र, नामों से जाना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, हरीतकी में पांचो रस मधुर, तीखा, कडुवा, कसैला, और खट्टा पाए जाते हैं। हरड़ के दो प्रकार हैं, छोटी और बड़ी। छोटी हरड़, बड़ी हरड़ से करीब आधी होती है। बड़ी हरड़ पीले रंग की होती है और इस पर धारियाँ होती है। दोनों ही हरड़ को औषधीय प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हरीतकी (छोटी हरड़) जो पानी में डालने पर डूब जाए वह अच्छी मानी जाती है। हरीतकी के त्ताज़े और सूखे दोनों ही रूपों में प्रयोग किया जाता है। ताज़े फल एकत्र कर, साफ़ कर, नमक के पानी में भिगो कर बाद में अचार की तरह बना कर रख लिया जाता है। इसे खाने से कब्ज से राहत मिलती है। यह अपच और याददाश्त में भी लाभदायक है। पके सूखे फल को पीस कर पाउडर बना कर औषधीय प्रयोग किया जाता है। इस पाउडर का एक चम्मच की मात्रा में शाम को गर्म पानी के साथ सेवन करने से लीवर फंक्शन और सिर दर्द में लाभ होता है।

छोटी हरड़ का वानस्पतिक परिचय-

यह एक ऊँचा वृक्ष होता है एवं मूलतः निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से लेकर पूर्व बंगाल-आसाम तक पाँच हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है । यह 50 से 60 फीट ऊँचा वृक्ष है । इसकी छाल गहरे भूरे रंग की होती है, पत्ते आकार में वासा के पत्र के समान 7 से 20 सेण्टीमीटर लम्बे, डेढ़ इंच चौड़े होते हैं । फूल छोटे, पीताभ श्वेत लंबी मंजरियों में होते हैं । फल एक से तीन इंच लंबे, अण्डाकार होते हैं, जिसके पृष्ठ भाग पर पाँच रेखाएँ होती हैं । कच्चे फल हरे तथा पकने पर पीले धूमिल होते हैं । बीज प्रत्येक फल में एक होता है । अप्रैल-मई में नए पल्लव आते हैं । फल शीतकाल में लगते हैं । पके फलों का संग्रह जनवरी से अप्रैल के मध्य किया जाता है ।

छोटी हरड़ का रासायनिक संगठन-

हरड़ में ग्राही (एस्टि्रन्जेन्ट) पदार्थ हैं, टैनिक अम्ल (बीस से चालीस प्रतिशत) गैलिक अम्ल, चेबूलीनिक अम्ल और म्यूसीलेज । रेजक पदार्थ हैं एन्थ्राक्वीनिन जाति के ग्लाइको साइड्स । इनमें से एक की रासायनिक संरचना सनाय के ग्लाइको साइड्स सिनोसाइड ‘ए’ से मिलती जुलती है । इसके अलावा हरड़ में दस प्रतिशत जल, 13.9 से 16.4 प्रतिशत नॉन टैनिन्स और शेष अघुलनशील पदार्थ होते हैं । वेल्थ ऑफ इण्डिया के वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लूकोज, सार्बिटाल, फ्रूक्टोस, सुकोस, माल्टोस एवं अरेबिनोज हरड़ के प्रमुख कार्बोहाइड्रेट हैं । 18 प्रकार के मुक्तावस्था में अमीनो अम्ल पाए जाते हैं । फास्फोरिक तथा सक्सीनिक अम्ल भी उसमें होते हैं । फल जैसे पकता चला जाता है, उसका टैनिक एसिड घटता एवं अम्लता बढ़ती है । बीज मज्जा में एक तीव्र तेल होता है

छोटी हरड़ किन बिमारियों में काम आती है ?

हरीतकी फल का गूदा बवासीर piles, क्रोनिक दस्त, पेचिश chronic diarrhea, dysentery, कब्जियत constipation, पेट फूलना flatulence, दमा asthma, मूत्र विकार urinary disorders, उल्टी vomiting, हिचकी hiccup, पेट के कीड़े intestinal worms, जलोदर ascites और बढ़े हुए प्लीहा और यकृत enlarged spleen and liver के उपचार में प्रयोग होता है। फल का पाउडर, पुरानी अल्सर और घाव chronic ulcers and wounds, दांत में कीड़ा, मसूड़ों से खून, आदि में प्रयोग किया जाता है.

कच्चा फल प्रवाहिका और अतिसार में लाभकारी है। पका हुआ फल रसायन, वात को नीचे ले जाने वाला, और रक्तवर्धक माना जाता है। हरीतकी का प्रयोग पेट रोग, लीवर के लिए और रसायन की तरह होता है। बाहरी रूप से हरीतकी का प्रयोग छालों के लिए और दन्त मंजनों को बनाने के लिए होता है।

छोटी हरड़ के आयुर्वेदिक और घरेलू उपचार :-

  1. अर्श piles :- हरीतकी चूर्ण ३ ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार गर्म पानी के साथ लें। और एक तरीका है बवासीर से बहुत परेशान हो तो हर्रे निबौली और गुड का लड्डू  बनाकर एक गिलास मट्ठे के साथ २१ दिन तक सुबह सवेरे खा लीजिये। २ ग्राम हर्रे, २ ग्राम निबौली का चूर्ण और एक चम्मच गुड का एक लड्डू बनेगा
  2. मुंह में कोई घाव, कोई रोग या छाले हो तो शहद, हर्रे और सेंधा नमक मिला कर पेस्ट बनाइये और दोनों टाइम इसी से ब्रश कीजिये।
  3. भूख बढ़ाने के लिए low appetite :- हरीतकी के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढती है।
  4. भूख न लगना :- हरीतकी का बारीक़ चूर्ण सोंठ, सेंधा नमक और गुड के साथ मिला कार दिन में दो बार सेवन करने से भूख और पाचन में सुधार होता है।
  5. उल्टी vomiting :- हरीतकी पीस कर शहद के साथ चाट कर खाने से लाभ होता है। हरीतकी का चूर्ण १ ग्राम की मात्रा में शहद के साथ चाटने से लाभ होता है।
  6. हिचकी में Hiccups :- हरीतकी के चूर्ण पानी के साथ सेवन करें।
  7. मुंह के छाले :- हरीतकी को पानी में घिस कर लगाने से लाभ होता है।
  8. बाल झड रहे हो तो ५ ग्राम हर्रे का पाउडर सुबह सवेरे शहद मिला कर चाट लीजिये. ३ महीने तक
  9. कफ ,खांसी जैसे रोग हों तो सेंधा नमक के साथ ३ हर्रे रोज खाइए।
  10. फोड़े फुंसी ,गुस्सा ज्यादा आना या ब्लड प्रेशर हाई रहता हो तो चीनी के साथ हर्रे खाइये।
  11. पथरी हो तो हर्रे के काढ़े में रोज शहद मिला कर पीजिए।
  12. ऐसा कोढ़ जिसने शरीर को गला दिया हो तो रोगी को गोमूत्र में भीगी हुई हर्रे रोज खिलाये. रोज रात में ३ हर्रे गोमूत्र में भीगा दें सवेरे खाली पेट रोगी उन तीनो हर्रे को चबा ले तो एक साल में उसका शरीर बिलकुल स्वस्थ हो जायेगा।
  13. बच्चे को बुखार हो और दस्त भी हो रहा हो तो हर्रे, सोंठ,और जावित्री का काढा बनाकर पिलाइये ,दो बार पिलाने से ही बच्चा बिलकुल ठीक हो जायेगा।
  14. बलवान बनना चाहते हो तो हर्रे को घी में भून कर पीस लें फिर रोज ४ ग्राम पाउडर ४ ग्राम देशी घी मिला कर चाट लें.
  15. गठिया हो या जोड़ो में दर्द हो रहा हो तो हर्रे को एरंड के तेल में तल कर पाउडर बनाए और ४ ग्राम चूर्ण रोज पानी से निगल लीजिये।
    और एक बात —
      “हरड, बहेड़ा,आवला घी शक्कर संग खाय , हाथी दाबे कांख में चार कोस ले जाय “
  16. अम्लपित्त hyperacidity :- हरीतकी चूर्ण १ चम्मच की मात्रा में किशमिश के साथ खाने से लाभ होता है।
  17. कफ Cough :- हरीतकी चूर्ण १ चम्मच की मात्रा में काले नमक के साथ, दिन में दो बार खाने से लाभ होता है।

छोटी हरड़ का ऋतुओं में सेवन की विधि

रसायन की तरह सेवन करने के लिए, हरीतकी को वर्षा ऋतु में नमक के साथ, शरत ऋतु में शक्कर के साथ, हेमंत ऋतु में सोंठ के साथ, शिशिर में पिप्पली के साथ, वसंत में शहद के साथ और ग्रीष्म में गुड़ के साथ सेवन करना चाहिए।

छोटी हरड़ किसे नहीं खानी चाहिए

जो लोग कमजोर, बल रहित, रुक्ष, कृश, अधिक पित्त वाले हों उन्हें तथा गर्भावस्था में हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिए। उपवास में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को अधिक प्यास लगती हो, मुख सूखता हो और नया बुखार हो उन्हें भी इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

छोटी हरड़ पेट में जाकर माँ की तरह से देखभाल और रक्षा करती है । भूनी हुई छोटी हरड़ के सेवन से पाचन तन्त्र मजबूत होता है । हरड को चबाकर खाने से अग्नि बढाती है । पीसकर सेवन करने से मल को बाहर निकालती है । जल में पकाकर उपयोग से दस्त, नमक के साथ कफ, शक्कर के साथ पित्त, घी के साथ सेवन करने से वायु रोग नष्ट हो जाता है । छोटी हरड़ छोटी जरुर है लेकिन काम बड़े बड़ों के आती है 

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