HomeHealth Tips

भारत में जल जनित रोगों (water borne diseases) के कारण और निवारण

भारत में जल जनित रोगों (water borne diseases) के कारण और निवारण
Like Tweet Pin it Share Share Email

भारत में जल जनित रोग (Water Borne Diseases in India)

जल या पानी अनेक अर्थों में जीवनदाता है। इसीलिए कहा भी गया है। जल ही जीवन है। मनुष्य ही नहीं जल का उपयोग सभी सजीव प्राणियों के लिए अनिवार्य होता है। पेड़ पौधों एवं वनस्पति जगत के साथ कृषि फसलों की सिंचाई के लिए भी यह आवश्यक होता है। यह उन पांच तत्वों में से एक है जिससे हमारे शरीर की रचना हुई है और हमारे मन, वाणी, चक्षु, श्रोत तथा आत्मा को तृप्त करती है। इसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।

शरीर में इसकी कमी से हमें प्यास महसूस होती है और इससे पानी शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। अत: यह हमारे जीवन का आधार है। अब तक प्राप्त जानकारियो के अनुसार यह स्पष्ट हो गया है कि जल अस्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है इसलिए इसका शुद्ध साफ होना हमारी सेहत के लिए जरूरी है। शुद्ध और साफ जल का मतलब है वह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक अशुद्धियों और रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं से मुक्त होना चाहिए वरना यह हमारे पीने के काम नहीं आ सकता है।

रोगाणुओं जहरीले पदार्थों एवं अनावश्यक मात्रा में लवणों से युक्त पानी अनेक रोगों को जन्म देता है। विश्व भर में 80 फीसदी से अधिक बीमारियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रदूषित पानी का ही हाथ होता है। प्रति घंटे 1000 बच्चों की मृत्यु मात्र अतिसार के कारण हो जाती है जो प्रदूषित जल के कारण होता है।

”याज्ञवल्क्य संहिता” ने जीवाणुयुक्त गंदले, फेनिल, दुर्गन्धयुक्त, खारे, हवा के बुलबुल उठ रहे जल से स्नान के लिए भी निषेध किया है। लेकिन आज की स्थिति बड़ी चिन्ताजनक है। शहरों में बढ़ती हुई आबादी के द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले मल मत्र कूड़े करकट को पाइप लाइन अथवा नालों के जरिए प्रवाहित करके नदियों एवं अन्य सतही जल को प्रदूषित किया जा रहा है। इसी प्रकार विकास के नाम पर कल कारखानों छोटे-बड़े उद्योगों द्वारा भी निकले बहि:स्रावों द्वारा सतही जल प्रदूषित हो रहे हैं। जहां भूमिगत एवं पक्के सीवर/नालों की व्यवस्था नहीं है यदि है भी तो टूटे एवं दरार युक्त हैं अथवा जहां ये मल/कचरे युक्त जल भूमिगत पर या किसी नीची भूमि पर प्रवाहित कर दिए जाते हैं वहां ये दूषित जल रिस-रिसकर भूगर्भ जल को भी प्रदूषित कर रहे हैं।

कैसी विडम्बना है कि हम ऐसे महत्वपूर्ण जीवनदायी जल को प्रगति एवं विकास की अंधी दौड़ में रोगकारक बना रहे हैं। जब एक निश्चित मात्रा के ऊपर इनमें रोग संवाहक तत्व विषैली रसायन सूक्ष्म जीवाणु या किसी प्रकार की गन्दगी/अशुद्धि आ जाती है तो ऐसा जल हानिकारक हो जाता है। इस प्रकार के जल का उपयोग सजीव प्राणी करते हैं तो जलवाधित घातक रोगों के शिकार हो जाते हैं। दूषित जल के माध्यम से मानव स्वास्थ्य को सर्वाधिक हानि पहुंचाने वाले कारक रोगजनक सूक्ष्म जीव हैं। इनके आधार पर दूषित जल जनक रोगों को निम्न प्रमुख वर्गों में बांटा जा सकता है।

दूषित जल से रोगजनक जीवों से उत्पन्न रोग

(Diseases caused by pathogenic organisms in contaminated water)

विषाणु द्वारा (By Virus)- पीलिया (Yellow Fever), पोलियो(Polio), गैस्ट्रो-इंटराइटिस(Gastro-Intraitis), जुकाम(Colds) , संक्रामक यकृत षोध(Infection Liver Sod), चेचक (Smallpox)

जीवाणु द्वारा (By Bacteria) – अतिसार(Diarrhea) , पेचिस(Loose Motion) , मियादी बुखार(Paratyphoid), अतिज्वर(Atijhwar), हैजा(Cholera), कुकुर खांसी(Whooping Cough), सूजाक(Gonorrhea), उपदंश(Syphilis), जठरांत्र शोथ(Gastroenteritis), प्रवाहिका(Dysentery), क्षय रोग(Tuberculosis)।

प्रोटोजोआ द्वारा (By protozoa) पायरिया(Pyorrhea), पेचिस(Pecis), निद्रारोग(epidemic encephalitis), मलेरिया(Malaria), अमिबियोसिस रूग्णता(Amibiosis sickness), जियार्डियोसिस रूग्णता(Illness Jiardiosis)।

कृमि द्वारा(By Worm)- फाइलेरिया(Filariasis) , हाइडेटिड सिस्ट (Hydatid Cyst) रोग तथा पेट में विभिन्न प्रकार के कृमि (various types of stomach worms) का आ जाना जिसका स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

लैप्टास्पाइरल वाइल्स रोग(Laptaspairl Wails disease) :- रोग उत्पन्न करने वाले जीवों के अतिरिक्त अनेकों प्रकार के विषैले तत्व भी पानी के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इन विषैले तत्वों में प्रमुख हैं कैडमियम, लेड, भरकरी, निकल, सिल्वर, आर्सेनिक (Cadmium , lead , Brkri , nickel , silver , arsenic)आदि।

जल में लोहा, मैंगनीज, कैल्सीयम, बेरियम, क्रोमियम कापर, सीलीयम, यूनेनियम, बोरान, तथा अन्य लवणों जैसे नाइट्रेट, सल्फेट, बोरेट, कार्बोनेट, आदि की अधिकता से मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

जल में मैग्नीशियम व सल्फेट की अधिकता से आंतों में जलन पैदा होती है।

नाइट्रेट की अधिकता से बच्चों में मेटाहीमोग्लाबिनेमिया नामक बीमारी हो जाती है तथा आंतों में पहुंचकर नाइट्रोसोएमीन में बदलकर पेट का केंसर उत्पन्न कर देता है।

फ्लोरीन की अधिकता से फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो जाती है।

इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में प्रयोग की जाने वाली कीटनाशी दवाईयों एवं उर्वरकों के विषैले अंष जल स्रोतों में पहुंचकर स्वास्थ्य की समस्या को भयावह बना देते हैं। प्रदूषित गैसे कार्बन डाइआक्साइड तथा सल्फर डाइआक्साइड जल में घुसकर जलस्रोत को अम्लीय बना देते हैं। अनुमान है कि बढ़ती हुई जनसंख्या एवं लापरवाही से जहां एक ओर प्रदूषण बढ़ेगा वहीं ऊर्जा की मांग एवं खपत के अनुसार यह मंहगा हो जाएगा। इसका पेयजल योजनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

ऊर्जा की पूर्ति हेतु जहां एक ओर एक विशाल बांध बनाकर पनबिजली योजनाओं से लाभ मिलेगा वहीं इसका प्रभाव स्वच्छ जल एवं तटीय पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ेगा जिसके कारण अनेक क्षेत्रों के जलमग्न होने व बड़ी आबादी के स्थानान्तरण के साथ सिस्टोमायसिस तथा मलेरिया आदि रोगों में वृद्धि होगी। जल प्रदूषण की मात्रा जो दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। विकराल रूप धारण करेगी।

साफ, सुरक्षित जल अत: सभी प्रकार के जल प्रदूषण से बचने के लिए आवश्य़क हे कि पूरे जल प्रबंधन में जल दोहन उनके वितरण तथा प्रयोग के बाद जल प्रवाहन की समुचित व्यवस्था हो। सभी विकास योजनाएं सुविचरित और सुनियोजित हो। कल-कारखानें आबादी से दूर हों। जानवरों-मवेशियों के लिए अलग-अलग टैंक और तालाब की व्यवस्था हो। नदियां झरनों और नहरों के पानी को दूषित होने से बचाया जाए। इसके लिए घरेलू और कल-कारखानों के अवशिष्ट पदार्थों को जल स्रोत में मिलने से पहले भली-भांति नष्ट कर देना चाहिए।

डिटरजेंट्स का प्रयोग कम करके प्राकृतिक वनस्पति पदार्थ का प्रचलन करना होगा। इन प्रदूषणों को रोकने के लिए कठोर नियम बनाना होगा और उनका कठोरता से पालन करना होगा। मोटे तौर पर घरेलू उपयोग में पानी का प्रयोग करने से पहले यह आश्वस्त हो जाना चाहिए कि वह शुद्ध है या नहीं? यदि संदेह हो कि यह शुद्ध नहीं है तो निम्न तरीकों से इसे शुद्ध कर लेना चाहिए।

जल को शुद्ध करने के तरीके (Ways to purify water)

पीने के पानी को स्वच्छ कपड़े से छान लेना चाहिए अथवा फिल्टर का प्रयोग करना चाहिए।

कुएं के पानी को कीटाणु रहित करने के लिए उचित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग प्रभावी रहता है। वैसे समय-समय पर लाल दवा डालते रहना चाहिए। पानी को उबाल लें फिर ठंडा कर अच्छी तरह हिलाकर वायु संयुक्त करने के उपरान्त इसका प्रयोग करना चाहिए।

पीने के पानी को धूप में, प्रकाश में रखना चाहिए। तांबे के बर्तन में रखे तो यह अन्य बर्तनों की अपेक्षा सर्वाधिक शुद्ध रहता है। एक गैलेन पानी को दो ग्राम फिटकरी या बीस बूंद टिंचर आयोडीन या तनिक या ब्लीचिंग पाउडर मिलाकर शुद्ध किया जा सकता है। चारकोल, बालू युक्त बर्तन से छानकर भी पानी शुद्ध किया जा सकता है। सम्पन्न लोग हैलोजन की गोलियां डालकर भी पानी साफ रखते हैं।

बरसात के जल से होने वाली बीमारियां (Diseases due to rain water)

बरसात का सुहाना मौसम कई बार तकलीफ की वजह बन जाता है। बारिश चाहे इस बार कम हुई है, लेकिन इससे जुड़ी बीमारियां जरूर सताने लग गई हैं। बरसात से जुड़ी समस्याओं की रोक-थाम और इलाज पर पेश है पूरी जानकारी।

आंखों की समस्याएं (Eye Problems)

कंजंक्टिवाइटिस (conjunctivitis) कंजंक्टिवाइटिस, आई फ्लू या पिंक आई के नाम से जानी जाने वाली यह बीमारी आम वायरल की तरह है और जब भी मौसम बदलता है, इसका असर देखा जाता है।

– बचाव के लिए हाइजीन मेनटेन करना सबसे जरूरी है। इस सीजन में हाथ मिलाने से भी बचें क्योंकि हाथों के जरिए संक्रमण फैल सकता है।

– अगर समस्या हो जाए तो साफ-सफाई बरतें, आंखों को ताजे पानी या बोरिक एसिड मिले पानी से धोएं।
– आंखों को मसलें नहीं क्योंकि इससे रेटिना में जख्म हो सकता है। ज्यादा समस्या होने पर खुद इलाज करने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें।

कितनी तरह का :
कंजंक्टिवाइटिस तीन तरह का होता है – वायरल, एलर्जिक और बैक्टीरियल।
डाइग्नोसिस: कंजंक्टिवाइटिस का आमतौर पर लक्षणों से ही पता लग जाता है। फिर भी यह किस टाइप का है, इसकी जांच के लिए स्लिट लैंप माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल करते हैं और बैक्टीरियल इंफेक्शन के कई मामलों में कल्चर टेस्ट भी किया जाता है।
इलाज: वायरल कंजंक्टिवाइटिस कॉमन कोल्ड की तरह होता है और आमतौर पर एक हफ्ते में अपने आप ठीक हो जाता है। इसमें बोरिक एसिड से आंखों को धोने की सलाह दी जाती है। एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस में नॉन स्टेरॉयडल ऐंटिइन्फ्लेमेट्री मेडिकेशन की जरूरत होती है और बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में बैक्टीरियल आई ड्रॉप इस्तेमाल करने के लिए कहा जाता है।

स्किन की समस्याएं (Skin Problems)
फंगल इन्फेक्शन (Fungal Infection) : बारिश में रिंगवॉर्म यानी दाद-खाज की समस्या बढ़ जाती है। पसीना ज्यादा आने, मॉइस्चर रहने या कपड़ों में साबुन रह जाने से ऐसा हो सकता है। इसमें गोल-गोल टेढ़े-मेढ़े रैशेज़ जैसे नजर आते हैं, रिंग की तरह। ये अंदर से साफ होते जाते हैं और बाहर की तरफ फैलते जाते हैं। इनमें खुजली होती है और एक से दूसरे में फैल जाते हैं। अगर फंगल इन्फेक्शन बालों या नाखूनों में है तो खाने के लिए भी दवा दी जाती है। फ्लूकोनोजोल (Fluconazole) ऐसी ही एक दवा है।
क्या करें: ऐंटि-फंगल क्रीम क्लोट्रिमाजोल (Clotrimazole) लगाएं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से ग्राइसोफुलविन (Griseofulvin) या टर्बिनाफिन (Terbinafine) टैबलेट ले सकते हैं। ये दोनों जिनेरिक नेम हैं।
फोड़े-फुंसी/दाने: इन दिनों फोड़े-फुंसी, बाल तोड़ के अलावा पस वाले दाने भी हो सकते हैं। पहले दाना लाल होता है, फिर पस आने लगता है। कई बार बुखार भी आ जाता है। आम धारणा है कि ऐसा आम खाने से होता है, लेकिन यह सही नहीं है। यह मॉइस्चर में पनपने वाले बैक्टीरिया से होता है।
क्या करें: दानों पर ऐंटिबायॉटिक क्रीम लगाएं, जिनके जिनेरिक नाम फ्यूसिडिक एसिड (Fusidic Acid) और म्यूपिरोसिन (Mupirocin) हैं। ग्लैंड्स ज्यादा काम कर रहे हैं तो क्लाइंडेमाइसिन (Clindamycin) लोशन लगा सकते हैं। यह मार्केट में कई ब्रैंड नेम से मिलता है। ऐंटिऐक्नी साबुन एक्नेएड (Acne-Aid), एक्नेक्स (Acnex), मेडसोप (Medsop) आदि भी यूज कर सकते हैं। ये ब्रैंड नेम हैं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर खाने के लिए भी ऐंटीबायॉटिक टैबलेट देते हैं।
घमौरियां/रैशेज़: स्किन में ज्यादा मॉइस्चर रहने से कीटाणु (माइक्रोब्स) आसानी से पनपते हैं। इससे रैशेज और घमौरियां हो जाती हैं। ये ज्यादातर उन जगहों पर होती हैं, जहां स्किन फोल्ड होती है, जैसे जांघ या बगल आदि में। पेट और कमर पर भी हो जाती हैं।
क्या करें: ठंडे वातावरण यानी एसी और कूलर में रहें। दिन में एकाध बार बर्फ से सिंकाई कर सकते हैं और घमौरियों व रैशेज पर कैलेमाइन (Calamine) लोशन लगाएं। खुजली ज्यादा है तो डॉक्टर की सलाह पर खुजली की दवा ले सकते हैं।

ऐथलीट्स फुट (Athlete’s foot)
जो लोग लगातार जूते पहने रहते हैं, उनके पैरों की उंगलियों के बीच की स्किन गल जाती है। समस्या बढ़ जाए तो इन्फेक्शन नाखून तक फैल जाता है और वह मोटा और भद्दा हो जाता है।
ऐथलीट्स फुट का इलाज (Treatment of Athlete’s foot) : जूते उतार कर रखें और पैरों को हवा लगाएं। खुली चप्पल पहनें। जूते पहनना जरूरी हो तो पहले पैरों पर पाउडर डाल लें। क्लोट्रिमाजोल (Clotrimazole) क्रीम या पाउडर लगाएं। डॉक्टर को फौरन दिखाएं। इस इलाज घर बैठकर खुद करना सही नहीं है। डॉक्टर जरूरत पड़ने पर ऐंटिबायॉटिक या ऐंटिफंगल मेडिसिन देंगे।

बरसात में रखें ध्यान (Keep in mind the rainy)
  1. – खुले, हल्के और हवादार कपड़े पहनें।
  2. – टाइट और ऐसे कपड़े न पहनें, जिनमें रंग निकलता हो।
  3. – कपड़े धोते हुए उनमें साबुन न रहने पाए।
  4. – ऐंटिबैक्टीरियल साबुन जैसे कि मेडसोप, सेट्रिलैक (Cetrilak) आदि से दिन में दो बार नहाएं।
  5. – शरीर को जितना मुमकिन हो, सूखा और फ्रेश रखें।
  6. – बारिश में बार-बार भीगने से बचें। – पैरों और हाथों की उंगलियों में मॉइस्चर न रहें।
  7. – लगाने वाली दवा भी कम लगाएं। उससे गीलापन बढ़ता है। उससे बेहतर पाउडर लगाना है।
  8. – पानी खूब पिएं। इससे शरीर में गर्मी कम रहेगी।
  9. – पेट साफ रखें। कब्ज न होने दें, वरना शरीर गर्म रहेगा।
  10. – नॉन ऑइली और कूलिंग क्लींजर, फेसवॉश, लोशन और डियो यूज करें।
  11. – डायबीटीज के मरीज शुगर को कंट्रोल में रखें।
  12. – फुटवेयर साफ रखें।

Source Article :- http://www.healthcarefriend.in/http://hindi.indiawaterportal.org/

loading...
Loading...