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प्रसूति के बाद पुरानी मान्यताओं को क्यों थोपा जाता है ?

प्रसूति के बाद पुरानी मान्यताओं को क्यों थोपा जाता है ?
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प्रसूति के बाद एकांतवास का क्या अर्थ है?

प्रसूति के बाद कुछ शुरूआती दिनों के लिए नई माँ और उसके नवजात शिशु को घर के अन्दर ही रखने की परंपरा रही है। माँ और नवजात शिशु को प्रसूति के बाद संक्रमण से बचाने और नई माँ को शिशु के जन्म के दौरान आने वाली मुश्किलों के कारण जो थकावट होती है उस से उबारने के लिए यह परंपरा शुरू हुई।

भारत के विभिन्न समुदायों के बीच प्रसूति के बाद एकांतवास अवधि की अलग-अलग परंपराएं व प्रथाएं हैं। मगर, सामान्यतः यह माना जाता है कि नई माँ को इस दौरान अधिक से अधिक आराम करना चाहिए और घर का काम-काज कम से कम करना चाहिए।

अक्सर, एक माँ एकांतवास अवधि का पालन तभी कर सकती है, जब उसे परिवार के सदस्यों का सहयोग हासिल हो। संयुक्त परिवारों में रहने वाली माँओं या फिर अपने माता-पिता के घर जाकर डिलीवरी कराने वाली माँओं द्वारा पारंपरिक एकांतवास प्रथाओं का पालन करने की अधिक संभावना होती है। कई नई माएं इस दौरान मालिश के लिए मालिशवाली या घर के काम में मदद करने के लिए कामवाली या दाई को रख लेती हैं।

पारंपरिक तौर पर, एक नई माँ के लिए, एकांतवास की अवधि में कई पाबंदियां होती हैं। शिशु के जन्म की थकान से उबरने के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं, ये पाबंदियां इन्हीं मान्यताओं पर आधारित हैं। यदि आपको इनमें से कुछ प्रतिबंधो का पालन करने में कठिनाई हो रही है, तो अपने परिवार के सदस्यों से बात करें।

चिंता या तनाव आपके दूध की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, साथ ही आपकी सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है। विशेषकर, यदि आप प्रसव के बाद के अवसाद से पीड़ित हैं, तो हो सकता अत्याधिक प्रतिबंध आपको और निराश कर दें।

प्रसूति के बाद एकांतवास की अवधि कितनी लंबी होती है?

एकांतवास की अवधि अलग-अलग क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होती है। उत्तरी, पश्चिमी और दक्षिणी भारत के ज्यादातर हिस्सों में, महिलाएं शिशु के जन्म के बाद लगभग 40 दिनों तक घर में ही रहती हैं। पूर्व में, खासतौर से पूर्वोत्तर राज्यों में, एकांतवास की धारणा पर दृढ़ता से अमल नहीं किया जाता। उत्तर भारत में यह अवधि काफी छोटी होती है। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में यह अवधि 60 दिन तक भी होती है।

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हालांकि, काफी माताएं पारंपरिक एकांतवास का पालन नहीं करती। शायद इसलिए, क्योंकि उन्हें वापस अपनी नौकरी पर जाना होता है या फिर उनके पास जरुरी सहयोग नहीं है। कुछ माताएं प्रसव के बाद एकांतवास की इस धारणा को पुराने जमाने की बात मानती हैं।

शिशु के जन्म के बाद के शुरुआती कुछ सप्ताह आप कैसे गुजारना चाहती हैं, यह पूरी तरह आप पर, आपके परिवार पर और आपकी मान्यताओं पर निर्भर करता है।

प्रसूति के बाद एकांतवास की अवधि में सामान्यतः क्या होता है?

नई माँ की मालिश :- एकांतवास के दौरान दिन में एक बार नई माँ के पूरे शरीर की मालिश की जाती है। इससे आपके थके हुए शरीर को काफी आराम मिलेगा। यह आपके रक्तसंचार में भी मदद करता है। अगर आपका सीजेरियन ऑपरेशन हुआ है, तो यहां पढ़ें कि किस तरह ऑपरेशन के बाद सुरक्षित मालिश कराई जा सकती है।

शिशु की मालिश :- कई माताएं अपने शिशुओं की रोजाना मालिश करती हैं। कई परिवारों में, शिशु की मालिश उसके नहलाने की दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। यह एकांतवास की अवधि के बाद भी जारी रहता है। अगर आप अपने शिशु की मालिश नहीं कर रही हैं, तो यह सुनिश्चित करें कि जो भी मालिश कर रहा है, कोमलतापूर्वक और सही तरीके से कर रहा है।

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अगर आपने मालिश के लिए किसी अनुभवी दाई या जापा बाई को रखा है, तो उस पर भी हमेशा नजर रखें। अक्सर अस्पतालों में ऐसे नवजात शिशुओं को देखा गया है, जिनकी हड्डियों के जोड़ कड़क मालिश की वजह से खिसक गए हैं।

एकांतवास के दौरान आहार :- यह माना जाता है कि एकांतवास के समय व नई माँ की सेहत में सुधार का सीधा संबंध उसके खान-पान से है। भारत के हर क्षेत्र में कोई न कोई एकांतवास का पसंदीदा व्यंजन है, जो नई माँ को दिया जाता है ।

आमतौर पर यह माना जाता है की प्रसूति के बाद नई माँ के शरीर के “संतुलन” में बदलाव आता है और वह खून जाने के कारण “ठंडी अवस्था” में चला जाता है। इसलिए एकांतवास का भोजन अक्सर ऐसी सामग्रियों से बनाया जाता है, जो गर्माहट देने वाली मानी जाती हैं। माना जाता है की यह गर्म खाद्य पदार्थ माँ को शिशु के जन्म के बाद जल्द ठीक होने में मदद करते हैं।

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यहां कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों की सूची दी गई, जिनके सेवन करने या न करने की सलाह आपको दी जा सकती है, जैसेः

  • लौकी और तोरी दूध की आपूर्ति बढ़ाने के लिए अच्छे माने जाते हैं।
  • माना जाता है कि हर भोजन के बाद पान खाना, पाचन में मदद करता है।
  • यह समझा जाता है कि घी का ज्यादा सेवन शरीर की शक्ति वापस पाने और मांसपेशियों को सुधारने में मदद करता है।
  • फल, फलों का रस और सोडा युक्त पेय पदार्थ मना होते हैं, क्योंकि वह ठंडे माने जाते हैं।
  • हरी और लाल मिर्च पचाने में मुश्किल हो सकती है, इसलिए उनकी जगह काली मिर्च का सेवन करने के लिए कहा जा सकता है।
  • “वातीय” खाद्य पदार्थ जैसे प्याज, फूलगोभी, पत्ता गोभी और कटहल आपके दूध के जरिये शिशु के पेट में गैस बना सकते हैं। इसलिए इनका सेवन न करने के लिए कहा जाता है।

एकांतवास के प्रतिबंध :- जब आप प्रसव के बाद घर लौटेंगी तब ऐसा प्रतीत हो सकता है कि आपको अपनी सभी रोजमर्रा की आदतें बदलनी पड़ेंगी। ख़ास तौर पर तब, जब आप संयुक्त परिवार में या अपने माता-पिता के साथ रह रहीं हैं। आप कैसे स्नान करती हैं से लेकर क्या कपड़े पहनती हैं, तक सब कुछ के लिए नए निर्देश हो सकते हैं।

हरेक परिवार और क्षेत्र की प्रथाएं अलग-अलग हो सकती हैं। माना जाता है की एकांतवास के प्रतिबंधों का पालन करने से माँ को आगे जीवन में गठिया, सिरदर्द, शरीर में दर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से बचने में मदद मिलती है। हालांकि, इन सब मान्यताओं को साबित करने के लिए कोई चिकित्सकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

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एकांतवास में आपको जो भी करने या न करने की सलाह दी जाती है, वह इसी विश्वास पर आधारित होती है कि गर्माहट से आपकी सेहत में जल्दी सुधार होगा। आपको हर समय अपने आप को गर्म अवस्था में रखने की सलाह दी जाएगी, भले ही आपने शिशु को गर्मी के चिलचिलाते मौसम में जन्म दिया हो!

Article Source :- http://www.babycenter.in/

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