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पेशाब को रोकने से होने वाले नुक्सान

पेशाब को रोकने से होने वाले नुक्सान
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पेशाब का संक्रमण से बचना है तो ध्यान रखें इन बातों को 

पेशाब संक्रमण की कई वजह हो सकती हैं लेकिन जो आमतौर पर देखने में आती हैं उनमे पेशाब को रोकने से हुआ संक्रमण के रोगी की संख्या ज्यादा है  एक अनुमान के अनुसार 77 प्रतिशत महिलाएं पेशाब संबंधी समस्याओं की शिकार होती हैं। पुरुषों में जहां यूटीआई की समस्या 40 की उम्र के बाद देखने को मिलती है, वहीं लड़कियां कई कारणों की वजह से कम उम्र में ही इसकी शिकार होने लगती हैं। एक ओर जहां सेहत व स्वच्छता के प्रति जागरूकता इसकी मुख्य वजह है वहीं गांवों में शौचालयों की कमी भी महिलाओं की इस समस्या को गंभीर बना देते हैं।

यह रोग पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में ज्यादा देखने में आता है। इसका कारण यह है कि स्त्रियों की पेशाब नली दो इंच की होती है और पुरुषों की मूत्र नलिका ७ इंच लंबाई  की होती है। छोटी नलिका से होकर संक्रमण सरलता से मूत्राषय को आक्रांत कर लेता है। गर्भवती स्त्रियां और सेक्स-सक्रिय औरतों में मूत्राषय प्रदाह रोग अधिक पाया जाता है। रितु निवृत्त महिलाओं में भी यह रोग अधिक होता है।

मूत्राषय में रोग-जीवाणुओं का संक्रमण होने से मूत्राषय प्रदाह रोग उत्पन्न होता है। निम्न मूत्र पथ के अन्य अंगों किडनी, यूरेटर और प्रोस्टेट ग्रंथि और योनि में भी संक्रमण का असर देखने में आता है। इस रोग  के कई कष्टदायी लक्षण होते हैं जैसे-तीव्र गंध वाला पेशाब होना,पेशाब का रंग बदल जाना, मूत्र त्यागने में जलन और दर्द  अनुभव होना, कमजोरी मेहसूस होना,पेट में पीडा और शरीर में बुखार की हरारत रहना। हर समय मूत्र त्यागने की ईच्छा बनी रहती है। मूत्र पथ में जलन  बनी रहती है। मूत्राषय में सूजन आ जाती है। यह रोग पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में ज्यादा देखने में आता है।

पेशाब संक्रमण क्यों और कैसे होता है ?

महिला रोगी की उम्र 29 वर्ष है। वह एक निजी कंपनी में मार्केटिंग विभाग में काम करती हैं। फील्ड जॉब होने के कारण उसे अकसर बाहर ही रहना पड़ता है। सार्वजनिक शौचालयों की संख्या कम होने के कारण वह अकसर पेशाब की जरूरत को नजरअंदाज कर देती हैं। लंबे तक जब ऐसा चला तो उन्हें निचले हिस्से में जलन महसूस हुई, जांच कराई तो पता चला कि उनके पेशाब में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ी हुई है। यहां तक कि इस कारण महिला रोगी किडनी में स्टोन होने की पहली अवस्था तक पहुंच चुकी है। दरअसल महिला रोगी ने पेशाब की जरूरत पर यूरिनरी ब्लेडर खाली नहीं किया, जिसके कारण पेशाब की अतिरिक्त मात्रा दोबारा किडनी तक पहुंची और पेशाब के टॉक्सिक तत्व किडनी में पहुंचने से वह स्टोन का रूप लेने लगे। लघु शंका की छोटी जरूरत इतनी परेशानी पैदा कर देगी यह उसने कभी नहीं सोचा था। पेशाब के रूप में दरअसल किडनी शरीर के अपशिष्ट पद्धार्थों को बाहर निकालती है, एक दिन में साधारण आठ से दस गिलास पानी पीने पर आठ से दस बार यूरिन की जरूरत महसूस होती है। जिसे किडनी की टॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया के लिए जरूरी माना गया है।

पेशाब संक्रमण महिलाओं में होती है अधिक समस्या

पुरुषों में 45 की उम्र के बाद पेशाब संबंधी परेशानी बढ़ने की आशंका अधिक रहती है, जबकि महिलाओं में यूटीआई की समस्या 15 से 40 की उम्र तक अधिक देखी जाती है। मेनोपॉज के बाद भी महिलाओं में पेशाब संबंधी समस्याएं और बढ़ जाती है। इसकी प्रमुख वजह एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर का कम होना होता है। यूटीआई, ब्लेडर संक्रमण, गर्भावस्था, उम्र, प्रोस्टेट ग्रंथि में बदलाव या पेशाब संबंधी अन्य कई संक्रमण कई वजह से होते हैं। गांव में मासिक धर्म के बाद स्वच्छता न बरतने के कारण लड़कियों में पेशाब संबंधी संक्रमण होते हैं, जो बाद में यूटीआई में बदल जाते हैं। जबकि महिलाओ में प्रसव के बाद 79 फीसदी मामलों में पेशाब पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। जिसकी वजह पेलविक (बच्चेदानी के नीचे का हिस्सा) की मांसपेशियों का ढीला होना होता है, ऐसे अधिकांश मामलों में महिलाओं को छींक के साथ पेशाब रिसने की समस्या होती है। महिलाओं में यूरेथ्रा(मूत्रनली) की लंबाई पुरुषों के मुकाबले कम होती है, इससे बैक्टीरिया के लिए वहां पहुंचना आसान होता है। महिलाओं में यूरेथ्रा गूदा मार्ग के ज्यादा करीब स्थित होता है। पुरुषों में यूटीआई का खतरा कम होता है क्योंकि उनका यूरेथ्रा लंबा होता है और प्रोस्टेट में बनने वाला द्रव्य बैक्टीरिया से लड़ने में सक्षम होता है।

पेशाब संक्रमण से बचना है तो कब-कब खाली करें ब्लेडर

दवाब के बाद भी यदि तीन से चार मिनट भी पेशाब को रोका गया तो यूरिन के टॉक्सिक तत्व किडनी में वापस चले जाते हैं, जिसे रिटेंशन ऑफ यूरिन कहते हैं। सफदरजंग अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग के पूर्व प्रमुख और वर्तमान में साकेत सिटी अस्पताल में काम कर रहे यूरोलॉजिस्ट डॉ. एनके मोहंती कहते हैं कि पेशाब शरीर की सामान्य प्रक्रिया है, जिसे महसूस होने पर एक से दो मिनट के अंदर निष्कासित कर देना चाहिए। पसीने की तरह पेशाब के माध्यम से गैर जरूरी तत्व भी बाहर निकलते हैं। यदि वह थोड़े समय भी अधिक शरीर में रहते हैं तो संक्रमण की शुरुआत हो सकती है। महिलाओं व कामकाजी युवाओं में पेशाब संबंधी दिक्कतें सामनें आ रही हैं, जिसकी शुरूआत ब्लेडर में दर्द के रूप में होती है। महिलाओं में लघु शंका संबंधी आदत में सामाजिक तत्व अधिक देखा गया है, जो एक से दो घंटे तक पेशाब रोक लेती है। वहीं 8 से 10 घंटे बैठ कर काम करने वाले युवाओं को पेशाब की जरूरत ही तब महसूस होती हैं, जबकि वह कार्य करने की स्थिति बदलते हैं। जबकि इस दौरान किडनी से यूरिनरी ब्लेडर में पेशाब इकठ्ठा होता रहता है। हर एक मिनट में दो एमएल पेशाब ब्लेडर में पहुंचता है, जिसे प्रति एक से दो घंटे के बीच खाली कर देना चाहिए। ब्लेडर खाली करने में तीन से चार मिनट की देरी में पेशाब दोबारा किडनी में वापस जाने लगता है, इस स्थिति के बार-बार होने से पथरी की शुरूआत हो जाती है। क्योंकि पेशाब में यूरिया और अमिनो एसिड जैसे टॉक्सिक तत्व होते हैं।

महिलाओं के लिए कम हैं सुविधाएं

महिला और पुरुष के लिए एक किलोमीटर के दायरे में एक सुलभ शौचालय जरूर होना चाहिए। यूरोलॉजिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया की अगर मानें तो महिलाओं के यूरिनरी सुविधाएं पुरुषों की अपेक्षा कम हैं, जिन्हें बढ़ाया जाना चाहिए। देर तक पेशाब रोकने के कारण महिलाओं में गर्भाशय संबंधी परेशानियां भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में मधुमेह रोगियों की परेशानी अधिक गंभीर हैं, जिन्हें ब्लेडर भरने के बाद भी पेशाब की जरूरत नहीं होती। इसलिए उन्हें प्रत्येक एक घंटे बिना दवाब के भी पेशाब करने जाना चाहिए।

डाइट से बन सकती है बात
यूटीआई की वजह हालांकि संक्रमण को बताया गया है, बावजूद इसके डाइट के जरिए संक्रमण को रोका जा सकता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के एक अध्ययन में पाया गया कि डाइट में मौजूद पोषक तत्व और फाइबर का सीधा असर यूटीओ संक्रमण से हैं। 186 महिलाओं पर पांच साल तक किए अध्ययन में देखा गया कि जो महिलाएं नियमित रूप से चेरी, कैरबरी, फल और दूध को अपने खाने में शामिल करती हैं, उनमें संक्रमण स्तर ऐसे महिलाओं की अपेक्षा कम देखा गया, जो खाने में पौष्टिक चीजों को शामिल नहीं करती। लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल की डायटिशियन डॉ. किरन दीवान कहती हैं, दरअसल यूटीआई का कारक ई कोलाई बैक्टीरिया के संक्रमण बढ़ने का असर है, जिसका कारण  शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आना है। इसलिए अधिक फाइबर और प्रोटीन युक्त भोजन केवल बैक्टीरियल संक्रमण ही नहीं अन्य बीमारियों के खतरे से भी बचाते हैं।

क्या है यूटीआई ?
ई-कोलाई बैक्टीरिया को यूटीआई कारण माना जाता है जो मूत्र के रास्ते से ही मूत्र ब्लेडर तक पहुंचता है। मूत्र की थैली तक संक्रमण पहुंचने की स्थिति को सिस्टिस कहते हैं जबकि संक्रमण किडनी तक पहुंचने पर फिलोनेफिराइटिस कहा जाता है, इसका मतलब है कि बैक्टीरिया का संक्रमण अपर यूरिनरी ट्रैक्ट तक पहुंच चुका है। यूटीआई के लक्षण मूत्र करते हुए जलन का अनुभव होना, कम मूत्र होना, पेल्विक क्षेत्र में दर्द या चुभन, कभी कभी पेशाब में हल्का खून आना और दरुगध युक्त पेशाब यूटीआई के लक्षण हो सकते हैं। इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए शुरूआत की स्थिति में यूटीआई का मूत्र की कल्चर और रूटीन जांच से पता चल जाता है, बावजूद इसके नीचले हिस्से से सफेद पानी आदि की समस्या भी देखी जाती है तो पेप्स स्मीयर कराना सही कहा गया है। जांच के बाद सात दिन तक एंटीबायोटिक दवाओं के जरिए संक्रमण दूर करने की कोशिश की जाती है, सात दिन के बाद पेशाब का दोबारा कल्चर टेस्ट किया जाता है, यदि रिपोर्ट नेगेटिव हो तो दवाएं बंद कर दी जाती हैं। बावजूद  इसके यदि कल्चर रिपोर्ट पॉजिटिव हो तो थेरेपी की सलाह देते हैं।

जरूरी हैं यह जानें
– लघु शंका किडनी की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं, प्रत्येक एक मिनट में 2 एमएल पेशाब किडनी से यूरिनरी ब्लेडर में पहुंचता है।
– यूरिनरी ब्लेडर में 250 एमएल पेशाब एकत्र होने पर लघु शंका का अनुभव होता है।
– ब्लेडर भरने के बाद यदि उसे रोका गया तो इसका रिटेंशन शुरू होता है, यानि पेशाब वापस किडनी में जाने लगता है।
– सामान्य व्यक्ति को दिन की अपेक्षा रात में लघु शंका की कम शिकायत होती हैं, क्योंकि इस समय शरीर गतिशील नहीं होता।
– पेशाब बार-बार रोकने से ब्लेडर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, यह पेशाब की करने की क्षमता को भी कम करता है।

आधुनिक चिकित्सक एन्टीबायोटिक दवाओं से इस रोग को काबू में करते हैं लेकिन कुदरती और घरेलू पदार्थॊं  के उपचार से भी इस रोग  पर शीघ्र ही काबू  पाया जा सकता है।

पेशाब संक्रमण से बचने के घरेलू नुस्खे :- 

  1. खीरा ककडी का रस इस रोग में अति लाभदायक है। २०० मिलि ककडी के रस में एक बडा चम्मच नींबू का रस  और एक चम्मच शहद मिलाकर हर तीन घंटे के फ़ासले से पीते रहें।
  2. पानी और अन्य तरल पदार्थ प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें। प्रत्येक १० -१५ मिनिट के अंतर पर एक गिलास पानी या फ़लों का रस पीयें। सिस्टाइटिज नियंत्रण का यह रामबाण उपचार है।
  3. मूली के पत्तों का रस लाभदायक है। १०० मिलि रस दिन में ३ बार प्रयोग करें।
  4. नींबू का रस इस रोग में उपयोगी है। वैसे तो नींबू स्वाद में खट्टा होता है लेकिन गुण क्षारीय हैं। नींबू का रस मूत्राषय में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होता है। मूत्र में रक्त आने की स्थिति में भी लाभ होता है।
  5. पालक रस १२५ मिलि में नारियल का पानी मिलाकर पीयें। तुरंत फ़ायदा होगा। पेशाब में जलन मिटेगी।
  6. पानी में मीठा सोडा यानी सोडा बाईकार्ब मिलाकर पीने से तुरंत लाभ प्रतीत होता है लेकिन इससे रोग नष्ट नहीं होता। लगातार लेने से स्थिति ज्यादा बिगड सकती है।
  7. गरम पानी से स्नान करना चाहिये। पेट और नीचे के हिस्से में गरम पानी की बोतल से सेक करना चाहिये। गरम पानी के टब में बैठना लाभदायक है।
  8. मूत्राषय प्रदाह रोग की शुरुआत में तमाम गाढे भोजन बंद कर देना चाहिये। दो दिवस का  उपवास करें। उपवास के दौरान पर्याप्त मात्रा में तरल,पानी,दूध लेते रहें।
  9. विटामिन सी (एस्कार्बिक एसिड) ५०० एम जी दिन में ३ बार लेते रहें। मूत्राषय प्रदाह निवारण में उपयोगी है।
  10. ताजा भिंडी लें। बारीक काटॆं। दो गुने जल में उबालें। छानकर यह काढा दिन में दो बार पीने से मूत्राषय प्रदाह की वजह से होने वाले पेट दर्द में राहत मिल जाती है।
  11. आधा गिलास मट्ठा में आधा गिलास जौ का मांड मिलाएं इसमें नींबू का रस ५ मिलि मिलाएं और पी जाएं। इससे मूत्र-पथ के रोग नष्ट होते है।
  12. आधा गिलास  गाजर का रस में इतना ही पानी मिलाकर पीने से मूत्र की जलन दूर होती है। दिन में दो बार प्रयोग कर सकते हैं।

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Article source :- http://www.livehindustan.com/

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